CBSE Big Decision: स्कूलों में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म, अब पढ़नी होंगी 2 भारतीय भाषाएं, जानें नया नियम

Shailendra Tiwari
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​CBSE का बड़ा फैसला: अब स्कूलों में खत्म होगी अंग्रेजी की अनिवार्यता। 'थ्री-लैंग्वेज' फॉर्मूले के तहत पढ़नी होंगी 2 भारतीय भाषाएं, सत्र 2026-27 से लागू होगा नियम। देश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में एक ऐतिहासिक बदलाव होने जा रहा है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत भाषा चयन के नियमों में बड़ा फेरबदल किया है। नए नियमों के मुताबिक, अब स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ना अनिवार्य नहीं होगा।।

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CBSE का बड़ा बदलाव: सत्र 2026-27 से अंग्रेजी अनिवार्य नहीं होगी। 'थ्री-लैंग्वेज' फॉर्मूले के तहत छात्रों को 2 भारतीय भाषाएं पढ़ना होगा जरूरी। पूरी जानकारी।
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HIGHLIGHTS
  1. ​अंग्रेजी अब अनिवार्य नहीं: वैकल्पिक विषय के रूप में चुनी जा सकेगी अंग्रेजी या कोई विदेशी भाषा।
  2. ​भारतीय भाषाओं पर जोर: तीन में से कम से कम दो भारतीय भाषाओं का अध्ययन करना होगा अनिवार्य।
  3. ​सत्र 2026-27 से शुरुआत: कक्षा 6 से लागू होगी व्यवस्था, 2034 तक कक्षा 10 तक होगी प्रभावी।


​1.​ ​​​​​क्या है नया 'भाषा फॉर्मूला' (R1, R2, R3)?

​बोर्ड ने भाषाओं को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है, जिसे समझना हर छात्र और अभिभावक के लिए जरूरी है:

  • ​R1 (प्राथमिक भाषा): छात्र की मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा।
  • ​R2 (दूसरी भाषा): अनिवार्य रूप से कोई भी एक भारतीय भाषा (जैसे हिंदी, संस्कृत, मराठी, बंगाली आदि)।
  • ​R3 (तीसरी भाषा): इसमें छात्र अंग्रेजी या किसी विदेशी भाषा (जर्मन, फ्रेंच आदि) का चुनाव कर सकते हैं, लेकिन यह अब वैकल्पिक (Optional) होगी।


​2. संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं को मिलेगा बढ़ावा

​विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से संस्कृत सबसे बड़े विकल्प के रूप में उभरेगी। इसके अलावा पंजाबी, तमिल और तेलुगु जैसी क्षेत्रीय भाषाओं के लिए भी स्कूलों में नए अवसर खुलेंगे। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य छात्रों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना और भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देना है।


​3. स्कूलों के सामने संसाधनों की चुनौती

​इस नीति को लागू करना स्कूलों के लिए एक बड़ी चुनौती भी है। महानगरों के स्कूलों में हिंदी के अलावा दूसरी भारतीय भाषा के योग्य शिक्षकों की व्यवस्था करना कठिन कार्य होगा। हालांकि, शिक्षाविदों का कहना है कि अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म होने से छात्रों पर मानसिक दबाव कम होगा


​निष्कर्ष: सीबीएसई का यह कदम भारतीय शिक्षा प्रणाली को अधिक स्वदेशी और लचीला बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।



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