कटनी नगर निगम: पार्षदों की उपेक्षा पर फूटा गुस्सा, मुंह पर काली पट्टी बांधकर सदन पहुंचे वरिष्ठ पार्षद मिथलेश जैन

Shailendra Tiwari
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​जब सदन में 'मौन' ने मचाया शोर: कटनी नगर निगम में वरिष्ठ पार्षद ने मुंह पर काली पट्टी बांधकर जताया विरोधपार्षदों की अनदेखी पर बरसे मिथलेश जैन। लोकतंत्र में जब चुने हुए जनप्रतिनिधियों की आवाज दबने लगती है, तो विरोध के स्वर अनोखे रास्ते चुनते हैं। ऐसा ही कुछ नजारा आज कटनी नगर निगम की परिषद बैठक में देखने को मिला। नगर सरकार के कामकाज से नाराज वरिष्ठ पार्षद और वरिष्ठ अधिवक्ता मिथलेश जैन जब मुंह पर काली पट्टी बांधकर सदन पहुंचे, तो पूरी कार्यवाही में सन्नाटा पसर गया। उनका यह मौन विरोध, निगम प्रशासन की कार्यशैली पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान था।।
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कटनी नगर निगम में वरिष्ठ पार्षद मिथलेश जैन का अनोखा विरोध। मुंह पर काली पट्टी बांधकर पहुंचे परिषद बैठक, प्रशासन पर लगाया पार्षदों की अनदेखी का आरोप।
वरिष्ठ पार्षद मिथलेश जैन: मुंह पर काली पट्टी बांधकर सदन पहुंचे 

HIGHLIGHTS
  1. ​अनोखा विरोध: वरिष्ठ पार्षद मिथलेश जैन मुंह पर काली पट्टी बांधकर पहुंचे सदन, मौन रहकर जताया गुस्सा।
  2. ​अध्यक्ष की पहल: सभापति मनीष पाठक के विशेष अनुरोध पर खोला मौन, सदन की गरिमा का रखा मान।
  3. ​गंभीर आरोप: "जनप्रतिनिधियों के साथ हो रहा भेदभाव, फाइलों में दब रहे जनहित के प्रस्ताव।"

​1. मौन ने खींचा सबका ध्यान            

​​बैठक शुरू होते ही सदन में सबकी नजरें मिथलेश जैन पर टिक गईं। काली पट्टी बांधे पार्षद का शांत बैठना शोर-शराबे से भी ज्यादा असरदार साबित हुआनगर निगम अध्यक्ष मनीष पाठक ने सदन की गरिमा और चर्चा की आवश्यकता को देखते हुए श्री जैन से अनुरोध किया कि वे अपनी बात रखें। अध्यक्ष के मान और लोकतंत्र के सम्मान में उन्होंने पट्टी हटाई, लेकिन उनके शब्द बेहद तीखे थे



​2. "चुने हुए जनप्रतिनिधियों की आखिर क्या बिसात?"

​पट्टी हटाते ही पार्षद जैन ने निगम प्रशासन को आड़े हाथों लिया। उन्होंने प्रशासन के सामने अपनी पीड़ा और आक्रोश साझा करते हुए कहा:

  • ​प्रस्तावों की रद्दी: परिषद और समितियों में दिए जाने वाले जनहित के महत्वपूर्ण सुझावों को कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाता है।
  • ​भेदभाव का खेल: पार्षदों के साथ दोहरा व्यवहार हो रहा है, जिससे वार्डों के विकास कार्य पूरी तरह ठप पड़ गए हैं।
  • ​आवाज दबाने की कोशिश: अधिकारियों द्वारा जनप्रतिनिधियों की बातों को गंभीरता से न लेना लोकतंत्र का अपमान है।



​3. गहराते असंतोष का संकेत

​वरिष्ठ पार्षद के इस कदम ने सदन के अन्य सदस्यों के भीतर भी चल रही खींचतान को सतह पर ला दिया है। यह विरोध सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन सभी पार्षदों की आवाज मानी जा रही है जो महसूस करते हैं कि निगम की कार्यप्रणाली में उनकी भागीदारी शून्य होती जा रही है।



​निष्कर्ष: 

  • ​आज के घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि अगर नगर निगम प्रशासन ने अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं किया, तो आने वाले समय में यह 'चिनगारी' बड़े आंदोलन का रूप ले सकती है। शहर के विकास के लिए अधिकारियों और पार्षदों के बीच समन्वय होना अनिवार्य है।

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