कटनी: रेलवे की मुस्तैदी पर 108 एंबुलेंस की लापरवाही भारी, ऑटो से अस्पताल पहुंचा गंभीर यात्री

Shailendra Tiwari
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​जब सिस्टम 'बीमार' हो जाए: रेलवे ने तो दिखाई मुस्तैदी, पर 108 एंबुलेंस की सुस्ती ने मरीज को ऑटो में जाने पर किया मजबूर। कटनी स्टेशन पर देखने को मिली स्वास्थ्य सेवा की कड़वी सच्चाई।कहते हैं कि समय पर मिला इलाज किसी के लिए जीवनदान साबित हो सकता है, लेकिन अगर सरकारी सिस्टम की एंबुलेंस ही वक्त पर न पहुँचे, तो किसी की जान पर क्या बन आती है, इसका उदाहरण कटनी स्टेशन पर देखने को मिला। जहाँ एक तरफ रेलवे प्रशासन ने एक बीमार यात्री की जान बचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया, वहीं राज्य की '108 एंबुलेंस सेवा' की लापरवाही ने पूरी व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी।।
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कटनी: रेलवे की मुस्तैदी पर 108 एंबुलेंस की लापरवाही भारी, ऑटो से अस्पताल पहुंचा गंभीर यात्री
ऑटो रिक्शा को ही 'लाइफ सपोर्ट' बनाकर जिला अस्पताल रवाना किया गया
HIGHLIGHTS
  1. ​रेलवे की तत्परता: ट्रेन में यात्री की तबीयत बिगड़ते ही अलर्ट हुआ कंट्रोल रूम, प्लेटफॉर्म पर तैनात मिले डॉक्टर।
  2. ​सिस्टम की नाकामी: घंटों इंतजार के बाद भी नहीं पहुंची 108 एंबुलेंस, तड़पता रहा मरीज।
  3. ​बेबसी का सफर: जान बचाने के लिए मजबूरन मरीज को ऑटो रिक्शा में लादकर ले जाना पड़ा अस्पताल।

​1. उधना-मालदा टाउन एक्सप्रेस में मची चीख-पुकार            

ट्रेन संख्या 09013 उधना-मालदा टाउन एक्सप्रेस के स्लीपर कोच S2 में सफर कर रहे यात्री निर्मल भाई पटेल का ब्लड प्रेशर अचानक इतना बढ़ गया कि उनकी जान पर संकट आ गया। जैसे ही जबलपुर कंट्रोल रूम को इसकी खबर लगी, कटनी स्टेशन पर हड़कंप मच गया। ट्रेन रुकते ही रेलवे डॉक्टरों की टीम प्लेटफॉर्म पर मुस्तैद खड़ी थी, जिन्होंने ट्रेन के अंदर ही प्राथमिक उपचार देकर स्थिति को काबू में करने की कोशिश की।


​2. 108 एंबुलेंस: उम्मीद जो टूट गई

​डॉक्टरों ने मरीज की हालत देखते हुए उन्हें फौरन जिला अस्पताल रेफर करने की सलाह दी। नियम के मुताबिक 108 एंबुलेंस को कॉल किया गया, लेकिन मिनट घंटों में बदल गए और एंबुलेंस का कहीं अता-पता नहीं था। यह उस समय की बात है जब एक-एक सेकंड की कीमत मरीज के जीवन के बराबर थी।

​परिजनों का दर्द:- 

  •  "रेलवे के डॉक्टरों ने तो फरिश्ता बनकर मदद की, लेकिन सरकार की एंबुलेंस सेवा ने हमें बीच रास्ते में छोड़ दिया। क्या इसी भरोसे पर जनता अपनी जान सरकार के हाथ में सौंपती है?"



​​3. जब ऑटो बना 'एंबुलेंस'

​अंततः सिस्टम की सुस्ती के आगे हार मानकर परिजनों और रेलवे कर्मचारियों ने मरीज की जान बचाने के लिए कड़ा फैसला लिया। एंबुलेंस का इंतजार छोड़कर मरीज को कंधे पर सहारा देकर स्टेशन से बाहर लाया गया और एक ऑटो रिक्शा को ही 'लाइफ सपोर्ट' बनाकर जिला अस्पताल रवाना किया गया



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