कटनी रेस्क्यू मामला: 163 बच्चों के परिजनों का बड़ा दावा— "तस्करी नहीं, शिक्षा के लिए भेज रहे थे महाराष्ट्र"

Shailendra Tiwari
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​कटनी में 163 बच्चों के 'रेस्क्यू' मामले में नया मोड़: "हम तस्कर नहीं, मजबूर माता-पिता हैं", कटनी पहुंचे परिजनों का छलका दर्द। कटनी रेलवे स्टेशन पर चार दिन पहले जिस मामले ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था, उसमें अब एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने पुलिसिया थ्योरी पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। जिसे पुलिस 'मानव तस्करी' का बड़ा नेटवर्क मानकर चल रही थी, अब वहां बिहार से आए गरीब माता-पिताओं की सिसकियां और अपने बच्चों के भविष्य की चिंता दिखाई दे रही है।।
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कटनी स्टेशन पर रोके गए 163 बच्चों के मामले में परिजनों ने मानव तस्करी के आरोपों को नकारा। बिहार से कटनी पहुंचे अभिभावकों ने पेश किए दस्तावेज़।
कटनी पहुंचे परिजन : छलका दर्द

HIGHLIGHTS
  1. ​परिजनों का इंकार: बिहार से कटनी पहुंचे माता-पिताओं ने मानव तस्करी के आरोपों को सिरे से नकारा।
  2. ​बेहतर कल की तलाश: परिजनों का दावा— "शिक्षा के लिए महाराष्ट्र के मदरसों में भेज रहे थे बच्चे।"
  3. ​गर्मी और बेबसी: भीषण गर्मी के बीच थाने के चक्कर काटते मासूम और उनके परिजन हुए परेशान।

​1. "मजबूरी को अपराध न समझें" - परिजनों की गुहार             

​मंगलवार को बिहार के अररिया और आसपास के जिलों से दर्जनों परिजन कटनी जीआरपी थाने पहुंचे। आंखों में आंसू और हाथों में आधार कार्ड लिए इन माता-पिताओं का कहना है कि वे आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं। उन्होंने अपने बच्चों को अच्छी तालीम और रहने-खाने की सुविधा के लिए महाराष्ट्र के लातूर और नांदेड़ स्थित मदरसों में भेजा था।

​"हमने अपने बच्चों को अंधेरे से निकालने के लिए शिक्षकों के साथ भेजा था, हमें नहीं पता था कि हमारे अरमानों को 'तस्करी' का नाम दे दिया जाएगा।" - एक व्यथित अभिभावक



​2. जीआरपी की जांच और दस्तावेजों का जाल

​जीआरपी डीएसपी विजय गरौठिया ने बताया कि कानून अपनी प्रक्रिया का पालन कर रहा है। फिलहाल मामला इन बिंदुओं पर टिका है:

  • ​बयानों का मिलान: पहुंचे हुए माता-पिताओं के बयान दर्ज किए जा रहे हैं।
  • ​सत्यापन (Verification): परिजनों द्वारा दिखाए जा रहे दस्तावेजों की बारीकी से जांच की जा रही है कि क्या वे वास्तव में बच्चों के माता-पिता हैं।
  • ​शिक्षकों की भूमिका: बच्चों के साथ जा रहे शिक्षकों से भी पूछताछ जारी है।



​3. भीषण गर्मी और सिस्टम की उलझन

​इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा मार उन मासूमों पर पड़ी है जो पिछले चार दिनों से घर से दूर, भीषण गर्मी और कानूनी पूछताछ के बीच फंसे हैं। परिजनों का आरोप है कि पुलिस को कार्रवाई से पहले पूरी छानबीन करनी चाहिए थी, ताकि बेकसूरों को इस तरह मानसिक और शारीरिक पीड़ा न झेलनी पड़े।


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